जल संरक्षण की दिशा में नहीं हो रहे कोई प्रयास
बालाघाट। एक तरफ जहां जल संरक्षण जमीनी जलस्तर बढ़ाने की दिशा में तरह तरह की योजनाये एवं घोषणायें एवं घोषणाये हुआ करती है। लेकिन धरातल स्तर पर पानी सहेजने और जमीनी जल स्तर बढ़ाये जाने की दिशा में केवल कोरा ढिंडोरा ही पीटा जाता है। स्थिति यह है कि दिनो दिन जमीनी जल स्तर काफी नीचें पहुंचता चला जा रहा है।
हैंडपंप पानी की जगह हवा उगलने लगे है। नगर में आ रहे वैनगंगा नदी के जल पर लगभग सभी आश्रित बन गये है। वैनगंगा नदी से पानी लेकर लोंग अपने निस्तार से लेकर पेयजल तक की व्यवस्था करते हुये पानी को व्यर्थ भी फेंकते है। लेकिन जिस वैनगंगा से पानी लेते है। उसमें पानी बढ़ाने की दिशा में कोई उचित प्रयास नहीं कर पाते है। यदि ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन यहां से भी पानी मिलना बंद हो जायेगा।
अस्तित्व खो चुके पुराने जल स्त्रोत
एक तरफ जहां जल जंगल जमीन को सहजने के साथ पुराने जल स्त्रोतों को सहेजकर उनके संरक्षण उचित रखरखाव की दिशा में तरह तरह के क्रियाकल्प प्रदर्शित किये जाते है। लेकिन मुख्यालय में वर्षो पुराने कुआ बाबड़ी झरना और कुंड अपना अस्तित्व खो चुके है। नगर में जहां दर्जनो की संख्या में कुए हुआ करते थे। इन कुओ को कचरादान बनाकर इनका अस्तित्व ही मिटा दिया गया है। सुविधाभोगी लोंग केवल पाईप लाईनों द्वारा आने वाले वैनगंगा नदी के जल पर आश्रित होकर इन कुओं को पूरी तरह से विलुपत कर दिया गया है। ऐसी स्थिति में नगर में अब एक भी कुआ शेष नही बचा है। जिससे लोगों का निस्तार हो सके। जल स्त्रोतों के साथ उपेक्षित नजरिया के चलते उन कुओं की ना तो साफ सफाई कराई गई। और ना ही पानी सहेजने की दिशा में कोई पहल हुई। इन कुओं में पानी रहने से जहां लोगों का निस्तार हुआ करता था वहीं, जमीनी जलस्तर भी स्थिर बना रहता था। कुओं की बजाय हैंडपंप पानी देते रहते थे। लेकिन अब ना तो नगर में कुऐ बचे और ना ही झरने बहर कुंड यहां तक कि एक दो हैंडपंपो को छोड़ दिया जाये तो सबकी स्थिति गंभीर बनी हुई है।
तालाबो के नाम पर होती है खानापूर्ति
शासन द्वारा प्रत्येक ग्राम पंचायत में तालाबो के निर्माण हेतु बड़ी राशि आवंटित की जा रही है। लेकिन केवल कागजों पर तालाब बनते हुये खानापूर्ति ही देखी जा रही है। ना तो इनमें पानी है और ना ही सही तरीके से तालाबो का निर्माण हुआ है। यही हाल तेंदूखेड़ा के फुट्टा तालाब और विल तालाब तथा घोघरा नाला का बना हुआ है। इन तीनो जल स्त्रोतों की यदि उचित तरीके से हिफाजत हो जाये तो कुछ हद तक पानी भरा रहने से लोगों का निस्तार मवेशियो को पीने का पानी उपलब्ध हो सकता है। और आस पास का जमीनी जल स्तर भी बढ़ सकता है।
नही हो पा रही वाटर हार्वेस्टिंग की व्यवस्था
जमीनी जल स्तर बढ़ाये जाने की दिशा में शासकीय भवनो के साथ बहुमंजिला इमारतो भवनो में वाटर हार्वेस्टिंग की व्यवस्था करना अनिवार्य है। बरसात के बहते पानी एवं निस्तार के पानी को सहेजकर जमीन के भीतर पहुंचने से जमीनी जलस्तर बढऩे में काफी मददगार साबित हो सकते है। लेकिन इस दिशा में भी कोई प्रयास नही हो रहे है। जानकार और समझदार लोंग भी इस व्यवस्था से काफी दूर बने हुये है। पक्की बनती सड़के लेंटरनुमा फर्सो का पानी सीधा जमीन में ना जाकर नालियो के माध्यम से बाहर व्यर्थ चला जाता है। छोटे छोटे से विषय वस्तु ही हमारे समाधान के कारण है। लेकिन इनका पालन ना होना अपने हाथ से ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने के बराबर है।