बालाघाट में प्राथमिक शाला खलोंडी के प्रधान पाठक ने तीसरी पीढ़ी में भी घर की परंपरा रखी है कायम

 बालाघाट में प्राथमिक शाला खलोंडी के प्रधान पाठक ने तीसरी पीढ़ी में भी घर की परंपरा रखी है कायम


बालाघाट। बालाघाट जिले में परसवाड़ा तहसील के शासकीय प्राथमिक शाला खलोंडी में पदस्थ प्रधानपाठक ने तीसरी पीढ़ी में भी घर की परंपरा कायम रखी। वे अपने वेतन का अधिकांश हिस्सा स्कूल के निर्माण व बच्चों का भविष्य गडऩे में खर्च करते हैं। स्कूल की मरम्मत से लेकर पेंटिंग, पुट्टी आदि काम निजी तौर पर कराते है। इतना ही नहीं स्कूल में पढऩे वाले बच्चों की कापी पेन, बैग सहित अन्य व्यवस्था भी निजी खर्च पर करते हैं जिससे स्कूल में दर्ज संख्या बड़ी है और क्षेत्र में सरकारी स्कूल ने अपना नाम रोशन किया है।

प्रधानपाठक मनीष ब्रम्हे ने बताया कि परसवाड़ा में शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के लिए भवन बनाने जमीन नहीं मिल रही थी। बच्चों को स्कूल पडऩे दूर न जाना पड़े। इसके लिए उनके दादाजी स्व.जीवनलाल ब्रम्हे द्वारा स्कूल भवन बनाने खुद की एक एकड़ 62 डिसमिल जमीन दान कर दी। स्कूल विकास में पिता स्व. घनश्याम प्रसाद ब्रम्हे भी सहभागी रहे। इसी प्रेरणा को लेकर वह स्कूल में पडऩे आने वाले गरीब बच्चों को हर साल बैग, कापी, पेन के अलावा जरूरतमंद सामग्री व स्कूल पर सरकार से मिलने वाली 55 हजार रुपये वेतन से खर्च करते है। यह काम वह पिछले चार साल से लगातार करते आ रहे है। इतने साल में खुद ने 70 हजार रुपये से अधिक खर्च कर दिए है। स्कूल में वर्तमान में कक्षा पहली से लेकर पांचवीं तक 26 बच्चों की दर्ज संख्या है।

स्कूल की दीवार हो रही थी खराब करवाई पुट्टी व रंगरोगन:

वर्षा से स्कूल की दीवारें खराब होने लगी थी।दीवारों व छत को खराब होने से बचाने पेंटर से सलाह लेकर छत में पुट्टी व दीवारों पर पेंट करवा कर पूरा रंगरोगन कराया। इससे सभी कक्षाएं सुंदर दिखाई दे रही हैं और अच्छी जगह बैठने से बच्चों का भी पढ़ाई में मन लगा रहता है।स्कूल में समय-समय पर मरम्मत कार्य कराते है।

अपने वेतन से बच्चों पर पैसे खर्च करते हैं

शासकीय स्कूल को रंगरोगन व मरम्मत करने के लिए बहुत कम शिक्षक ही सामने आकर अपने वेतन से पैसे खर्च करते हैं। बच्चों के लिए भी कापी, बैग पेन पर खर्च कर रहे हैं तो यह प्रधानपाठक का कार्य सराहनीय है। ऐसा करने से स्कूल में दर्ज संख्या बढ़ती है और गरीब बच्चों को सहूलियत मिलती है। जिससे बच्चों की स्कूल आने में रुचि बनी रहती है।-एके उपाध्याय, जिला शिक्षा अधिकारी बालाघाट

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