दीवाली की चमक के बीच चंद रूपयों की आस में परिवार सहित बैठे दीये वाले
बालाघाट। बना कर दीये मिट्टी के, जरा सी आस पाली है। मेरी मेहनत खरीदों यारों, मेरे घर भी दीवाली हैÓ किसी शायर की यह मार्मिक लाइनें इन दिनों शहर की सडक़ों और चौराहों पर चंद रुपयों की आस में परिवार सहित बैठे गरीब कुम्हारों की पुकार लग रही है। बच्चों के लिए नए कपड़े, मिठाईयां और पटाखे दिलाने के अरमान लिए ये गरीब दीये वाले सुबह से दिनभर सडक़ों के किनारे ग्राहकों का इंतजार करते देखे जा सकते हैं। लेकिन अब तक वे इतना धंधा नहीं कर पाए हैं कि मुनाफा बचा सकें।
पत्रिका ने शुक्रवार को शहर के काली पुतली चौक में परिवार सहित दुकान लगाकर बैठे इन कुम्हारों से चर्चा की। इन्होंने अपनी परेशानी सांझा की। इस चौक में लिंगा निवासी सेवकराम जिजोते, परसवाड़ा का तेजराम टरंडे और भांडामुर्री का तीरनदास तो अपने दो बच्चों ज्योति और विक्रांत तुमन्ने के साथ दो दिनों दुकान लगा रहा है। इन्होंने बताया कि अब तक इतना मुनाफा नहीं निकल पा रहा है कि वे कुछ रुपए जोड़ कर घर ले जा सकें। 50-100 रुपए का धंधा हुआ भी तो वह बस का किराया और नगरपालिका के वसूल किए जाने वाले फुटपात के किराए में ही चला जा रहा है। नित्य बच्चों को अगले दिन अच्छा धंधा होने का दिलासा देकर लौटना पड़ रहा है। हालाकि इन गरीब दीये वालों की बातों में गजब का धैर्य और उम्मींदें भी नजर आए। जिनका कहना रहा कि अभी दीपोत्सव का मुख्य लक्ष्मी पूजन भी आने वाला है। ऐसे में आगामी दिनों में धंधे में उठाव की उम्मीदें है।
25 रुपए में एक दर्जन दीये
इन दीये वालों ने बताया कि इस बार उन्होंने कुछ अलग डिजाइन के दीये भी बनाए हैं। साधारण दीयों को 20 से 25 रुपए दर्जन विक्रय कर रहे हैं। वहीं डिजाइन दार दीयों का मुख्य 5 से 10 रुपए प्रति नग से लेकर 15 से 20 रुपए तक है। इन्होंने बताया कि मौसम की बेरूखी के कारण उन्हें मिट्टी मिलने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। वहीं दीयों को सुखाने के लिए लकड़ी व पेट्रोल का अलग खर्च वहन करना पड़ा है। ऐसे में दीयों के धंधों में कोई अधिक मुनाफा नहीं हो पा रहा है।
नपा से मिलनी चाहिए रियायतें
गरीब दीये वालों के विषय में शहर के गणमान्यों और प्रबुद्धजनों का कहना है कि गरीब कुम्हार और दीये वालों के परिवारों के विषय में शहर की नगरपालिका परिषद को सोचना चाहिए। वैसे ही मौसम की बेखरू से कुम्हार वर्ग परेशान है। ऐसे में नपा चाहे तो इनसे फुटपाती शुल्क वसूल न कर इनका सहयोग कर सकती है। वहीं इन्होंने शहरवासियों से भी इलेक्ट्रानिक रोशनी की सामग्री न खरीदते हुए इन गरीब दीये वालों से मिट्टी के दीयों की खरीदी किए जाने की अपील की है।