इन्होंने हौसले, जिद और सजगता से दी कैंसर को मात, आज हैं स्वस्थ
बालाघाट। आज विश्व कैंसर दिवस है। कैंसर एक ऐसी बीमारी, जिसका नाम सुनते ही जहन में डर और नकारात्मकता हावी हो जाती है, लेकिन शहर में ऐसे भी लोग हैं, जिन्होंने जानलेवा माने जाने वाली इस बीमारी को अपने हौसले, धैर्य और सजगता से न सिर्फ हराया बल्कि औरों के लिए नजीर पेश की।किसी ने कैंसर की एक-दो नहीं बल्कि तीन-तीन बार मार झेली, लेकिन आखिर तक हिम्मत नहीं हारी, तो किसी ने महज चार साल में ही कैंसर को मात दी। संदेह होने पर समय पर इलाज कराने की जागरुकता और कैंसर से लडऩे की जिद के बदौलत ही ये कैंसर योद्धा आज पहले जैसी जिंदगी जी रहे हैं। वहीं, बात करें जिले मेंं कैंसर के बढ़ते मामलों की तो बालाघाट में सबसे अधिक मुंह, स्तन और गर्भाश्य के कैंसर के मामले अधिक देखे जा रहे हैं। इसके पीछे वजह है लापरवाही और जागरुकता की कमी। बालाघाट में तेंदूपत्ता की अधिकता और बीड़ी-तंबाकू का उत्पादन मुंह के कैंसर को बड़ा रहा है तो ग्रामीण अंचलों की महिलाओं में जागरुकता की कमी स्तन व गर्भाश्य के कैंसर का ग्राफ ऊंचा कर रही है।
तीन बार हुआ कैंसर, हर बार हिम्मत ने दिया साथ
62 साल के टाइल्स कारोबारी चित्रंजन वेघड़ को एक बार नहीं, तीन-तीन बार कैंसर हुआ है, लेकिन हर बार उनकी हिम्मत और जिंदगी जीने की जिद ने कैंसर को हराया। श्री वेघड़ के मुताबिक, वह पहले पान-मसाला खाते थे। वर्ष 2008 में पहली बार कैंसर के बारे में पता चला। जीभ में सफेद दाग दिखने पर मैंने डाक्टर से संपर्क किया तो उन्होंने नागपुर जाने कहा। वहां जांच के बाद मुझे कैंसर होना बताया।मुंबई में आपरेशन हुआ तो 25 फीसदी जीभ काटनी पड़ी। थोड़ा स्वस्थ हुआ तो वर्ष 2012 में दोबारा मुंह का कैंसर रिपीट हो गया। डाक्टरों ने दोबारा 25 फीसदी जीभ काट दी। वर्ष 2016 में तीसरी बार कैंसर हुआ, लेकिन समय पर उपचार मिलने से कैंसर को पूरी तरह हराने में सफल रहा। जब पहली बार कैंसर होने की खबर परिवार वालों और मुझे पता चली तो सब घबरा गए। मेरे मन में तरह-तरह के नकारात्मक ख्याल आने लगे, लेकिन तय कर रखा था कि हारूंगा नहीं। समय पर इलाज और हौसला ही था, जिसने मुझे नई जिंदगी दी है। आज मैं पूरी तरह स्वस्थ हूं और अपना कारोबार संभाल रहा हूं।
समय पर इलाज ने बचाई बड़ी मां की जान
वार्ड क्रमांक-2 में रहने वालीं धनवंती धुवारे भी कैंसर की मार झेल चुकी हैं, लेकिन परिवार से मिले हौसले और खुद के जज्बे ने श्रीमती धुवारे को इस जंग में जीत दिलाई। धनवंती धुवारे के भतीजे यश धुवारे ने बताया कि उनकी बड़ी मां को चार साल पहले डाक्टरों ने स्तन कैंसर होना बताया। ये सुनते ही परिवार वाले अपना सुध-बुध खो बैठे। सब परेशान और डरे हुए थे, लेकिन चिकित्सकों ने समय पर इलाज शुरू किया और बड़ी मां पूरी तरह स्वस्थ हैं। यश धुवारे ने बताया कि कैंसर होने पर बड़ी मां का पूरा इलाज नागपुर के अस्पताल में हुआ। पहले स्टेज में कैंसर की पहचान हो गई थी। इलाज के दौरान बाल झड़े, शरीर टूट गया था, लेकिन ब?ी मां ने हिम्मत नहीं हारी और आज वह पहले की तरह जीवन जी रही हैं।
जिले में तेज से बढ़ रहा कैंसर का प्रभाव
पिछले 22 सालों से कैंसर पीडि़तों के लिए काम कर रहे समाजसेवी त्रिलोकचंद कोचर ने बताया कि जिले में कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इसके पीछे जागरुकता की कमी और बढ़ता व्यसन है।जिले में सबसे अधिक मुंह का कैंसर होता है क्योंंकि यहां गुटखा और बीड़ी पीने का चलन ज्यादा है। इसके बाद दूसरे नंबर पर स्तन कैंसर है। स्तन कैंसर का बड़ा कारण बीड़ी का व्यसन और महिलाओं द्वारा बच्चों को नवजात बच्चे को स्तनपान न कराना है। स्तनपान न कराने से गांठ बनती है जो कैंसर का कारण बनता है।तीसरे नंबर पर गर्भाश्य का कैंसर है, जो जिलेे की आदिवासी क्षेत्रों की महिलाओं में देखा जाता है। जागरुकता की कमी के कारण महिलाएं सेहत और सफाई का ध्यान नहीं रखती है, जिसके कारण गर्भाश्य के कैंसर का शिकार होना पड़ता है।
इनका कहना
कैंसर से हर हाल में लड़ा और जीता जा सकता है। बस जरूरत है सजगता की। शरीर में अचानक बदलाव महसूस हों तो तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें। क्योंकि शुरुआती स्टेज में अगर इसकी पहचान होती है, तो मरीज के बचने की उम्मीद सौ फीसदी तक बनी रहती है। जांच या इलाज में देरी न करें और व्यसन से दूर रहें। अपनी दिनचर्या में व्यायाम, हरी सब्जियां, मौसमी फल शामिल करें।
डा. संजय धबडग़ांव, सिविल सर्जन, जिला अस्पताल