बांस और गोबर की राखियों की खूब डिमांड, 15 महिलाओं का समूह रोज बना रहा 250 राखियां

 बांस और गोबर की राखियों की खूब डिमांड, 15 महिलाओं का समूह रोज बना रहा 250 राखियां


  बालाघाट। राखी...भाई-बहन के प्रेम का बंधन। कच्चे धागे से जुड़े अटूट बंधन और बहन की रक्षा करने के वचन की डोर को इस बार बांस, गोबर और छींद से बनी राखियां और मजबूत करेगी। बालाघाट में वन विभाग के बांस हस्तशिल्प कला केंद्र पश्चिम बैहर में बांस की राखियां बन रही हैं। 15 महिलाओं का समूह एक से बढ़कर एक डिजाइनर राखियां बना रहा है। इसका आकर्षण नागपुर (महाराष्ट्र) और रायपुर (छत्तीसगढ़) तक पहुंच रहा है। बाजारों में इसकी खासी मांग है। सिवनी में गोबर तो छिंदवाड़ा में छींद से राखियां बनाई जा रही हैं।

 बनाई 10 हजार राखियां

  बालाघाट में 15 महिलाओं का समूह बांस से रोज 200-250 राखियां बना रहा है। कारीगरों ने बताया कि इस बार राज्य से बाहर भी अच्छी मांग है।

 जैविक को बढ़ावा, गोबर की राखी

  बहनें इस बार भाइयों को गोबर से बनी राखियां बांधेंगी। गो अनुसंधान देवलापार और सुनवारा में ग्रामीण ऐसी अनूठी राखी बना रहे हैं। इससे जहां एक ओर लोगों को रोजगार मिला है, वहीं यह इको-फ्रेंडली भी है। युवा किसान व जैविक खेती को बढ़ावा देने का काम कर रहा ऑर्गेनिक फॉर्म शुक्रवारी बाजार में इसकी बिक्री भी कर रहा है। फॉर्म संचालक अंकित मालू ने बताया, पांच हजार जैविक राखियों की बिक्री हो चुकी है। 

तामिया में छींद से बनाई राखियां 

छिंदवाड़ा. पातालकोट के आदिवासी कलाकार ने छींद से पर्यावरण हितैषी राखियां तैयार की हैं। दो गांवों के तीन आदिवासी परिवार ये राखियां बना रहे हैं। इसे बाजार में भी उतारा है। इसी तरह पारडसिंगा में एक संस्था ने जैविक कपास से राखी बनाई है।

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